Monday, 28 October 2013

आई एफ डब्ल्यू जे देश के पत्रकारों का एकमात्र संगठन: सतीश सक्सेना

 
भोपाल 28 अक्टूबर 2013। इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्ल्यूजे) के 63 वें स्थापना दिवस पर एम.पी.यूनिट के संयोजक साथी सतीश सक्सेना ने कहा कि आई.एफ.डब्ल्यू.जे. देश के पत्रकारों का एक मात्र संगठन है, जो निरंतर श्रमजीवी पत्रकारों के कल्याण की दिशा में सक्रिय है। 
श्री सक्सेना भोपाल में आयोजित एक समारोह में बोल रहे थे। कार्यक्रम का संचालन सलमान खान ने किया। कार्यक्रम  में भोपाल की छानबीन समिति के संयोजक साथी राजेन्द्र कश्यप ने आव्हान किया है कि गोवा अधिवेशन के संकल्पों को पूरा करने का समय आ गया है। हमारे सामने एक साथ केन्द्र तथा राज्य सरकार के साथ चुनौती के साथ खड़ा होना पड़ेगा। 
कार्यक्रम में महेश सिंह, राजेन्द्र मेहता, जवाहर सिंह राजू खत्री, दीपक कुमार सहित अनेक पत्रकार उपस्थित थे। 

आई एफ डब्ल्यू जे देश के पत्रकारों का एकमाात्र संगठन:सतीश सक्सेना


भोपाल। 28 अक्टबर 2013 इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्ल्यूजे) के 63 वें स्थापना दिवस पर एम.पी.यूनिट के संयोजक साथी

सतीश सक्सेना ने कहा कि आई.एफ.डब्ल्यू.जे. देश के पत्रकारों का एक मात्र संगठन है,जो निरंतर श्रमजीवी पत्रकारों के कल्याण की दिशा में सक्रिय

है।
श्री सक्सेना भोपाल में आयोजित एक समारोह में बोल रहे थे। कार्यक्रम का संचालन सलमान खान ने किया। कार्यक्रम  में भोपाल की

छानबीन समिति के संयोजक साथी राजेन्द्र कश्यप ने आव्हान किया है कि गोवा अधिवेशन के संकल्पों को पूरा करने का समय आ गया है। हमारेे

सामने एक साथ केन्द्र तथा राज्य सरकार के साथ चुनौती के साथ खड़ा होना पड़ेगा ।
कार्यक्रम में महेश सिंह,राजेन्द्र मेहता,जवाहर सिंह राजू खत्री,दीपक कुमार सहित अनेक पत्रकार उपस्थित थे।


राजेेन्द्र कश्यप  संयोजक वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन भोपाल (सदस्यता छानबीन समिति)  मोबाईल क्रमांक 9753041701

Saturday, 26 October 2013

क्रांतिकारी पत्रकार स्वर्गीय गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म दिन मनाया गया

क्रांतिकारी पत्रकार स्वर्गीय गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म दिन मनाया गया
 भोपाल। 26 अक्टूबर स्वर्गीय गणेश विद्यार्थी क्रांतिकारी पत्रकार इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट से संबंद्ध भोपाल वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन संभागीय इकाई एवं गणेश शंकर विद्यार्थी स्मृति संस्थान के सदस्यों के संयुक्त तत्वाधान में वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र कश्यप की अध्यक्षता में क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के जन्म दिवस पर एक बैठक में सर्वप्रथम उनके चित्र पर माल्यापर्ण किया गया पश्चात् में उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर वक्ताओं ने प्रकाश डालते हुए उनको स्मरण किया । बैठक में दिल्ली से पधारे मुुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार विद्याधर चतुर्वेदी ने उनके जीवन की विभिन्न  घटनाओं से प्रेणा लेने का आव्हान किया।
देश केी आजादी की लड़ाई में पत्रकारों ने अपनी लेखनी को हथियार बनाया था। महात्मा मोहनदास करमचन्द गांधी,लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के साथ ही गणेश शंकर विद्यार्थी का विशिष्ट स्थान है। क्र ांतिकारी योद्धा पत्रकार के रूप में और अंग्रेजो के विरूद्ध विचारों की अग्नि से धधकती लेखनी से ब्रिटिश सत्ता को बेनकाब करने में गणेश शंकर विद्यार्थी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
आजादी की लड़ाई में हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षधर कानपुर के एक दंगे में शहीद हो गये । क्रांतिकारी पत्रकार के रूप में भारतीय पत्रकारों की स्वतंत्रता के लड़ाई के इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षर में हमेशा लिखा रहेगा। सभा में  युवा विद्यार्थी पत्रकारों ने भारी संख्या में उपस्थिति सराहनीय रही। आभार प्रतिवाद डाट काम के संपादक श्री दीपक शर्मा ने प्रगट किया।

                                                                                          रोहन सिंह
                                                                                                 कार्यालय सचिव
                                                                                             वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन
                                                                                 एम0आई0जी0 11/4 गीतांजली कांपलेक्स भोपाल

Friday, 25 October 2013

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पत्रकारिता के पुरोधा गणेशशंकर विद्यार्थी गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म (26 अक्टूबर, 1890) आश्विन शुक्ल 14, रविवार सं. 1947 को अपनी ननिहाल, इलाहाबाद के अतरसुइया मुहल्ले में श्रीवास्तव (दूसरे) कायस्थ परिवार में हुआ। इनके पिता मुंशी जयनारायण हथगाँव, जिला फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। माता का नाम गोमती देवी था। पिता ग्वालियर रियासत में मुंगावली के ऐंग्लो वर्नाक्युलर स्कूल के हेडमास्टर थे। वहीं विद्यार्थी जी का बाल्यकाल बीता तथा शिक्षादीक्षा हुई। विद्यारंभ उर्दू से हुआ और 1905 ई. में भेलसा से अँगरेजी मिडिल परीक्षा पास की। 1907 ई. में प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में कानपुर से एंट्रेंस परीक्षा पास करके आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला कालेज में भर्ती हुए। उसी समय से पत्रकारिता की ओर झुकाव हुआ और इलाहाबाद के हिंदी साप्ताहिक कर्मयोगी के संपादन में सयेग देने लगे। लगभग एक वर्ष कालेज में पढ़ने के बाद 1908 ई. में कानपुर के करेंसी आफिस में 30 रु. मासिक की नौकरी की। परंतु अंग्रेज अफसर से झगड़ा हो जाने के कारण उसे छोड़कर पृथ्वीनाथ हाई स्कूल, कानपुर में 1910 ई. तक अध्यापकी की। इसी अवधि में सरस्वती, कर्मयोगी, स्वराज्य (उर्दू) तथा हितवार्ता (कलकत्ता) में समय समय पर लेख लिख्ने लगे। 1911 में विद्यार्थी जी सरस्वती में पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी के सहायक के रूप में नियुक्त हुए। कुछ समय बाद "सरस्वती" छोड़कर "अभ्युदय" में सहायक संपादक हुए। यहाँ सितंबर, 1913 तक रहे। दो ही महीने बाद 9 नवंबर, 1913 को कानपुर से स्वयं अपना हिंदी साप्ताहिक प्रताप के नाम से निकाला। इसी समय से विद्यार्थी जी का राजनीतिक, सामाजिक और प्रौढ़ साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ। पहले इन्होंने लोकमान्य तिलक को अपना राजनीतिक गुरु माना, किंतु राजनीति में गांधी जी के अवतरण के बाद आप उनके अनन्य भक्त हो गए। श्रीमती एनीं बेसेंट के होमरूल आंदोलन में विद्यार्थी जी ने बहुत लगन से काम किया और कानपुर के मजदूर वर्ग के एक छात्र नेता हो गए। कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने तथा अधिकारियों के अत्याचारों के विरुद्ध निर्भीक होकर "प्रताप" में लेख लिखने के संबंध में ये 5 बार जेल गए और "प्रताप" से कई बार जमानत माँगी गई। कुछ ही वर्षों में वे उत्तर प्रदेश (तब संयुक्तप्रात) के चोटी के कांग्रेस नेता हो गए। 1925 ई. में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की स्वागतसमिति के प्रधान मंत्री हुए तथा 1930 ई. में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हुए। इसी नाते सन् 1930 ई. के सत्याग्रह आंदोलन के अपने प्रदेश के सर्वप्रथम "डिक्टेटर" नियुक्त हुए। साप्ताहिक "प्रताप" के प्रकाशन के 7 वर्ष बाद 1920 ई. में विद्यार्थी जी ने उसे दैनिक कर दिया और "प्रभा" नाम की एक साहित्यिक तथा राजनीतिक मासिक पत्रिका भी अपने प्रेस से निकाली। "प्रताप" किसानों और मजदूरों का हिमायती पत्र रहा। उसमें देशी राज्यों की प्रजा के कष्टों पर विशेष सतर्क रहते थे। "चिट्ठी पत्री" स्तंभ "प्रताप" की निजी विशेषता थी। विद्यार्थी जो स्वयं तो बड़े पत्रकार थे ही, उन्होंने कितने ही नवयुवकों को पत्रकार, लेखक और कवि बनने की प्रेरणा तथा ट्रेनिंग दी। ये "प्रताप" में सुरुचि और भाषा की सरलता पर विशेष ध्यान देते थे। फलत: सरल, मुहावरेदार और लचीलापन लिए हुए चुस्त हिंद की एक नई शैली का इन्होंने प्रवर्तन किया। कई उपनामों से भी ये प्रताप तथा अन्य पत्रों में लेख लिखा करते थे। अपने जेल जीवन में इन्होंने विक्टर ह्यूगो के दो उपन्यासों, "ला मिजरेबिल्स" तथा "नाइंटी थ्री" का अनुवाद किया। हिंदी साहित्यसम्मलेन के 19 वें (गोरखपुर) अधिवेशन के ये सभापति चुने गए। विद्यार्थी जी बड़े सुधारवादी किंतु साथ ही धर्मपरायण और ईश्वरभक्त थे। व्याख्याता भी बहुत प्रभावपूर्ण और उच्च कोटि के थे। स्वभाव के अत्यंत सरल, किंतु क्रोधी और हठी भी थे। कानपुर के सांप्रदायिक दंगे में 25 मार्च, 1931 ई. को धर्मोन्मादी मुसलमान गुंडों के हाथों इनकी हत्या हुई। सम्पादन कार्य इसके बाद कानपुर में गणेश जी ने करेंसी ऑफ़िस में नौकरी की, किन्तु यहाँ भी अंग्रेज़ अधिकारियों से इनकी नहीं पटी। अत: यह नौकरी छोड़कर अध्यापक हो गए। महावीर प्रसाद द्विवेदी इनकी योग्यता पर रीझे हुए थे। उन्होंने विद्यार्थी जी को अपने पास 'सरस्वती' के लिए बुला लिया। विद्यार्थी जी की रुचि राजनीति की ओर पहले से ही थी। यह एक ही वर्ष के बाद 'अभ्युदय' नामक पत्र में चले गये और फिर कुछ दिनों तक वहीं पर रहे। इसके बाद सन 1907 से 1912 तक का इनका जीवन अत्यन्त संकटापन्न रहा। इन्होंने कुछ दिनों तक 'प्रभा' का भी सम्पादन किया 

Thursday, 24 October 2013

परिचय एक श्रमजीवी पत्रकार का

परिचय एक श्रमजीवी पत्रकार का
गद्यकार, सम्पादक और टी.वी.-रेडियो समीक्षक, के. विक्रम राव श्रमपरिचय एक श्रमजीवी पत्रकार का
गद्यकार, सम्पादक और टी.वी.-रेडियो समीक्षक, के. विक्रम राव श्रमजीवी पत्रकारों के मासिक दि वर्किंग जर्नलिस्ट के प्रधान सपरिचय एक श्रमजीवी पत्रकार का
गद्यकार, सम्पादक और टी.वी.-रेडियो समीक्षक, के. विक्रम राव श्रमजीवी पत्रकारों के मासिक दि वर्किंग जर्नलिस्ट के प्रधान सम्पादक हैं। वे वाॅयस आॅफ़ अमेरिका (हिन्दी समाचार प्रभाग, वाशिंगटन) के दक्षिण एशियाई ब्यूरो में संवाददाता रहे। वे 1962 से 1998 तक दैनिक टाइम्स आॅफ़ इण्डिया (मुंबई) में कार्यरत थे। वे भारतीय प्रेस काउंसिल के 1991 से छह वर्षों तक लगातार सदस्य रहे। श्रमजीवी पत्रकारों के लिये भारत सरकार द्वारा 2008 में गठित जस्टिस जी.आर. मजीठिया वेतन बोर्ड (1996) और माणिसाणा वेतन बोर्ड के वे सदस्य थे। प्रेस सूचना ब्यूरो की केन्द्रीय प्रेस मान्यता समिति के भी पाँच वर्षों तक सदस्य थे। भारतीय श्रमजीवी पत्रकार फेडरेशन (IFWJ) के बारहवें राष्ट्रीय अध्यक्ष पुनः निर्वाचित होकर, विक्रम ने अपना तीन वर्षीय कार्यकाल 2010 से आरम्भ किया। तीसरी दुनिया का सबसे बड़ा पत्रकार संगठन IFWJ 28 अक्तूबर, 1950 में स्थापित हुआ था। आज उसके तीस हजार सदस्य 33 राज्यों व केन्द्रशासित इकाइयों में सत्रह भाषाओं के 1,260 से अधिक समाचारपत्रों, संवाद समितियों तथा टी.वी. में कार्यरत हैं। कोलम्बो सम्मेलन में एशियाई पत्रकार यूनियनों के परिसंघ के अध्यक्ष विक्रम राव निर्वाचित हुये हैं।
नई दिल्ली में जन्मे और गांधीजी के सेवाग्राम, चेन्नई, बापटला (आंध्र प्रदेश), नागपुर तथा पटना में शिक्षित, विक्रम राव ने समाजशास्त्र, अंग्रेजी व संस्कृत साहित्य में बी.ए. किया। लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एम.ए. के बाद उन्होंने स्नातकोत्तर छात्रों को अन्तर्राष्ट्रीय-कानून विषय पढ़ाया। उनका चयन भारतीय पुलिस सेवा ;प्च्ैद्ध में हो गया था, पर उन्होंने मुम्बई में टाइम्स आॅफ़ इण्डिया में रिपोर्टर होना अधिक पसन्द किया। उनका स्थानान्तरण अहमदाबाद, बड़ौदा, नागपुर, लखनऊ, हैदराबाद, गोवा, शिलंग, गुवाहाटी और भुवनेश्वर किया गया। वे दैनिक इकनामिक टाइम्स, पाक्षिक फि़ल्मफेयर और साप्ताहिक इलस्ट्रेटेड वीकली में भी काम कर चुके हैं। विक्रम राव की समाचार रपटों की चर्चा विभिन्न विधान मण्डलों तथा संसद के दोनों सदनों में होती रही हैं। मुरादाबाद, अहमदाबाद और हैदराबाद के साम्प्रदायिक दंगों पर इनकी रपट अपनी वास्तविकता और सत्यता के लिए प्रशंसित हुई। बुन्देलखण्ड और उत्तर गुजरात में अकाल स्थिति पर भेजी इनकी रपटों से सरकारी तथा स्वयंसेवी संगठनों ने तात्कालिक मदद भेजी जिससे कई प्राण बचाये जा सके। वे मुम्बई, हैदराबाद, कोचीन, दिल्ली और अहमदाबाद के पत्रकारिता संस्थानों में रिपोर्टिंग पर व्याख्याता भी हैं। करीब दो सौ दैनिक पत्र-पत्रिकाओं के स्तंम्भकार है। धर्मयुग और दिनमान में लिखते रहे। विक्रम राव की मातृभाषा तेलुगु है। वे मराठी, गुजराती तथा उर्दू भी जानते है।
प्रेस स्वाधीनता के लिए अथक संघर्षशील, विक्रम राव आपात्काल (1976) में 13 माह जेल में रहे, क्योंकि तब आई.एफ.डब्ल्यू.जे. के उपाध्यक्ष होने के नाते के उन्होंने प्रेस सेंसरशिप का विरोध किया था। पटना में काले बिहार प्रेस बिल के खिलाफ प्रदर्शन करते हुये वे कैद हुये थे। उनके अनवरत प्रयास के परिणाम में पालेकर, बछावत तथा मणिसाना वेतन बोर्डों द्वारा हजारों पत्रकारों को गत वर्षों में अत्यधिक लाभ हुआ है। प्रशिक्षण तथा शैक्षिक यात्रा हेतु विक्रम ने 950 पत्रकारों को अफ्रीका, यूरोप तथा अमरीका भेजा था। विक्रम राव सभी महाद्वीपों के 49 राष्ट्रों, अमरीका, क्यूबा, रूस, चीन, मिस्र, जिम्बांव्वे, ईराक सहित, में आयोजित मीडिया गोष्ठियों मंे भाग ले चुके है।
म्पादक हैं। वे वाॅयस आॅफ़ अमेरिका (परिचय एक श्रमजीवी पत्रकार का
गद्यकार, सम्पादक और टी.वी.-रेडियो समीक्षक, के. विक्रम राव श्रमजीवी पत्रकारों के मासिक दि वर्किंग जर्नलिस्ट के प्रधान स
उनके पिता स्वर्गीय श्री के. रामा राव लखनऊ में जवाहरलाल नेहरू के दैनिक नैशनल हेराल्ड के 1938 में संस्थापक-सम्पादक थे। लाहौर, बम्बई, मद्रास, कोलकता तथा दिल्ली से प्रकाशित कई अंग्रेजी दैनिकों का उन्होंने सम्पादन किया था। उन्हें ब्रिटिश राज ने 1942 में कारावास की सजा दी थी। वे संसद सदस्य थे तथा आई.एफ.डब्ल्यू.जे. के 1950 में प्रथम उपाध्यक्ष थे। विक्रम के ताऊजी स्वर्गीय के. पुन्नय्या कराची के मशहूर राष्ट्रवादी दैनिक सिंध आब्जर्वर के कई वर्षों तक सम्पादक थे तथा आल-इण्डिया न्यूजपेपर एडिटर्स कान्फ्रेन्स के संस्थापक-सदस्य थे।
आहार में निरामिष और सिगरेट व शराब से सख्त परहेजी, विक्रम राव एक कौटुम्बिक व्यक्ति हैं। उनके दो पुत्र और एक पुत्री है। उनकी पत्नी नई दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज में शिक्षित होकर भारतीय रेल में मुख्य मेडिकल निदेशक थीं।
उनका पता
7 गुलिस्ताँ कालोनी बन्दरियाबाग
लखनऊ - 226 001
तथा फोन 0522-2623939, 2235466
Website: ifwj.in
E-mail: k.vikramrao@yahoo.co.in
Or ifwj.media@gmail.com
Or k.vikramrao@gmail.com
म्पादक हैं। वे वाॅयस आॅफ़ अमेरिका (हिन्दी समाचार प्रभाग, वाशिंगटन) के दक्षिण एशियाई ब्यूरो में संवाददाता रहे। वे 1962 से 1998 तक दैनिक टाइम्स आॅफ़ इण्डिया (मुंबई) में कार्यरत थे। वे भारतीय प्रेस काउंसिल के 1991 से छह वर्षों तक लगातार सदस्य रहे। श्रमजीवी पत्रकारों के लिये भारत सरकार द्वारा 2008 में गठित जस्टिस जी.आर. मजीठिया वेतन बोर्ड (1996) और माणिसाणा वेतन बोर्ड के वे सदस्य थे। प्रेस सूचना ब्यूरो की केन्द्रीय प्रेस मान्यता समिति के भी पाँच वर्षों तक सदस्य थे। भारतीय श्रमजीवी पत्रकार फेडरेशन (I FWJ) के बारहवें राष्ट्रीय अध्यक्ष पुनः निर्वाचित होकर, विक्रम ने अपना तीन वर्षीय कार्यकाल 2010 से आरम्भ किया। ती
 

आई एफ डब्लयू जे के सम्मेलन के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है

आई एफ डब्लयू जे के सम्मेलन के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि सम्मेलन में पंजीकृत सदस्य को उपहार - भेट - प्रतीक रूप में कोई सामग्री नहीं दी गई। जबकि वाहन भर कर बैग आए थे। मध्यप्रदेश के लगभग तीस से अधिक पत्रकारो को जानबुझ कर उक्त् सामग्री से वंचित रखने में किसी साजिश की बू आती है। पांच सौ रूपए की राशी लेने के बाद हर सम्मेलन में बीते तुमकुर सम्मेलन में हाथ घडी दी गई थी लेकिन इस बार किसी भी प्रकार की उपहार सामग्री का न दिया जाना संगठन को बदनाम करने की साजिश का एक हिस्सा हो सकता है।
रा. अध्यक्ष के विक्रमराव, महासचिव परमानंद जी पाण्डे को इस बात की जांच करवाना चाहिए कि आखिर मध्यप्रदेश के तीस लोगो को क्यूं उपहार सामग्री नहीं दी गई जबकि पूरे मध्यप्रदेश से कोटामनी के रूप में पंजीयन स्वरूप 8 हजार रूपए की राशी मैने तथा एक हजार रूपए की राशी मनोज शर्मा, पांच रूपए जगदीश पंवार तथा विनय जी डेविड ने 7 हजार रूपए की राशी जमा कर रसीदे प्राप्त की गई।
संगठन हमारा एक अभिव्यक्ति का मंच है तथा फेसबुक उसका एक माध्यम इसलिए हम अपनी बात संगठन के समक्ष रख रहे है।
धन्यवाद
...

इण्डियन फ़ेडरेशन आॅफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स

आई एफ डब्लयू जे के सम्मेलन के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि सम्मेलन में पंजीकृत सदस्य को उपहार - भेट - प्रतीक रूप में कोई सामग्री नहीं दी गई। जबकि वाहन भर कर बैग आए थे। मध्यप्रदेश के लगभग तीस से अधिक पत्रकारो को जानबुझ कर उक्त् सामग्री से वंचित रखने में किसी साजिश की बू आती है। पांच सौ रूपए की राशी लेने के बाद हर सम्मेलन में बीते तुमकुर सम्मेलन में हाथ घडी दी गई थी लेकिन इस बार किसी भी प्रकार की उपहार सामग्री का न दिया जाना संगठन को बदनाम करने की साजिश का एक हिस्सा हो सकता है।
रा. अध्यक्ष के विक्रमराव, महासचिव परमानंद जी पाण्डे को इस बात की जांच करवाना चाहिए कि आखिर मध्यप्रदेश के तीस लोगो को क्यूं उपहार सामग्री नहीं दी गई जबकि पूरे मध्यप्रदेश से कोटामनी के रूप में पंजीयन स्वरूप 8 हजार रूपए की राशी मैने तथा एक हजार रूपए की राशी मनोज शर्मा, पांच रूपए जगदीश पंवार तथा विनय जी डेविड ने 7 हजार रूपए की राशी जमा कर रसीदे प्राप्त की गई।
संगठन हमारा एक अभिव्यक्ति का मंच है तथा फेसबुक उसका एक माध्यम इसलिए हम अपनी बात संगठन के समक्ष रख रहे है।
धन्यवाद
वदीय
रामकिशोर पंवार
ब्यूरो दैनिक पंजाब केसरी बैतूल
मालवीय वार्ड खंजनपुर बैतूल
मध्यप्रदेश
प्रदेश सचिव
एमपी वर्कीग जर्नलिस्ट यूनियन 
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